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Jain Dada Gurudeva Aarti - जैन गुरुदेवा आरती

Jain Gurudev aarti in Hindi, Jin Kushal Suri aarti, Shri Rajendra Suri aarti.

Dada Gurudeva Jin Kushal Suri - Form the origin of Jain religion, many saint and monk exist, but mostly the four aachraya have honor to be called and worship as Dada Gurudeva. Dada Gurudev mean supreme teacher and deity. The four dada are Shri Jin Datta Suri, Shri Manidhari Chandra Suri, Shri Jin Kushal Suri, Shri Jin Chandra Suri. Dada Jinkushal Suri is great monk in Jain religion especially in Khartar Gaccha. All Dada Gurudeva life is full of miracles, all four Dada show the path of Jainism. Temple of Dada Gurudeva called Dadavaadi where millions of devotee worship for getting grace of Dada. "Jai Jai Gurudeva, Aarti Mangal Meva" is famous aarti song of Dada Jin Kushal Suri.
Shri Rajendra Suri - Aacharya Rajendra Suri was the great monk in Swetamber Tapa Gaccha. He wrote many books on Jainism. He called Yati and later he rewarded as Aacharya. "Jay Jay Gurudeva, Suri Rajendra Ki Aarti, Ker pa Shiv Meva" is great aarti song of Dada Rajendra Suri.

Daada Gurudeva Aarthi - Jin Kushal Suri Aarti - Shri Rajendra suri Aarti

Jin Kushal Suri Aarati

Jin Kushal Suri Aarti - जिन कुशल सूरी आरती

जय जय गुरुदेवा, आरती मंगल मेवा, आनंद सुख लेवा, जय जय गुरुदेवा ।
एक व्रत, दोय व्रत, तीन चार व्रत, पंचम व्रत सोहे, भाविक जीव निस्तारण, सुरनर मन मोहे ।
दु:ख दोहग सब हर कर सद् गुरु राजन प्रतिबोधे, सुत लक्ष्मी वर देकर, श्रावक कुल सोधे ।
विध्या पुस्तक धरकर सद गुरु, मुगल पूत तारें, बस कर जगन चौषठ,पाँच पीर सारे ।
बीज पढंती वारी सदगुरु, समुद्र जहाज तारी, वीर किया वश बावन, प्रगटे अवतारी ।
जिनदत्त जिनचन्द्र कुशल सुरिश्वर, खरतरगच्छ राजा, चोरासी गच्छ पूजे मनवांछित ताजा ।
मन शुद्ध आरती कष्ट निवारण सद गुरु की कीजे, जो मांगे सो पावे, जग मे यश लीजे ।
विक्रमपुर मे भक्त तुम्हारों, मंत्र कलाधारी, नित उठ ध्यान लगावत, मनवांछित फल पावत, राम ऋद्धि सारी ।
जय जय गुरुदेवा, आरती मंगल मेवा, आनंद सुख लेवा, जय जय गुरुदेवा ।



Rajendra Suri Aarati

Shri Rajendrasuri Aarti - श्री राजेन्द्र सूरी आरती

ॐ जय जय गुरुदेवा, स्वामी जय जय गुरुदेवा, सुरि राजेन्द्र की आरती, कर पा शिव मेवा ।
छत्तीस गुण के धारक, तारक उपकारी, शत्रु मित्र सम जाने, बाल ब्रह्मचारी ।
धन्य पिता ऋषभाजी, केशर महतारी, धन्य भरतपुर नगरी, जन्मे गुणधारी ।
मिथ्या तिमिर विनाशक, चिंतामणि जेवा, मनवांछित फलदाता, करिये गुरु सेवा ।
हुए समधित गुरुवर, श्री मोहनखेड़ा, करुँ भक्ति तन मन से, पार करो बेड़ा ।
पूज्य यतीन्द्र कृपा से, पूरण हुई आशा, कुंदन वंदन कर ले, कटे करम पाशा ।
ॐ जय जय गुरुदेवा, स्वामी जय जय गुरुदेवा, सुरि राजेन्द्र की आरती, कर पा शिव मेवा ।


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